Sunday, January 29, 2012

रिश्ते..!!

आये यहाँ पर कुछ को साथ ले कर,
कुछ कमाए यहाँ आ कर,

हमेशा करते रहे उनको बचाने के कोशिश,
देते रहे हमेशा जो हमको एक कशिश,

अब सोचता हूँ, बचाऊँ उनको,
या खुद को उन से बचाऊं

रिश्ते ये जो मेरे पीछे चले,
या मैं चलूँ पीछे इनके,

या इन सब को भुला कर बस चलता ही जाऊं...!!

Sunday, August 21, 2011

अक्स..!!

ना जाने क्या ढूंढता हूँ,
इन अनगिनत तस्वीरों में...
हर पल बदलती तकदीरों में...
कुछ अधखुली उलझी जंजीरों में,,,

जीने की वजह, चाहत...
या फिर यूँ ही हर पल गुजरती,
इस जिंदगी का अक्स..!!

Tuesday, May 24, 2011

मुफलिसी..!!

है आलम मुफलिसी का आजकल
की फुरकत को ही मिलती है इज्जत,
है न तो इमां और न है जमीर
औ खुदी को, खुदा भी हैं कहते बेगैरत |

जर्रे से जन्में, है मंजिल भी जर्रा
इन्सां औ इंसानियत, की न करते हैं परवा,
है पहुंचे सितारे भी गर्दिश मैं उनके
कभी जो कहलाये थे सर्वे सर्वा |

Saturday, February 26, 2011

यादें ..!!

मैं बैठा हूँ यहाँ अपनी यादों के पैमानों के साथ,
जिंदगी भरती रही जिनको बदलते मैखानों के साथ |

आते जाते मिलते रहे लोग,
और मैं करता रहा दोस्ती अनजानों के साथ |

यादों का क्या है, वो तो यूं ही बिसरती रहीं,
हर पल गुजरते हुए जमानों के साथ |

Sunday, December 12, 2010

सोच...!!

जब जब मैंने ये सोचा की,
मैंने सब कुछ पा लिया,

तब तब मैंने खुद को हमेशा,
इस भीड़ में अकेला ही खड़ा पाया

पता नहीं कैसे खुश रहते हैं वो,
जिन लोगों ने इस दौड़ में सबको भुलाया

शायद कभी तो सोचेंगे वो,
की उन सब ने क्या खोया और क्या पाया|

Saturday, November 20, 2010

जब याद आता है..!!

बेगाने लगते हैं साथी सब जब याद आता है
की हम परिवार पीछे छोड़ आए हैं,

अच्छी नहीं लगती यह रफ़्तार जब याद आता है
की हम सबका साथ कहीं भूल आए हैं,

काटने को आती है उन्नति जब याद आता है
की हम नीयत कहीं भूल आए हैं,

क्या फायदा दिवाली के पटाखों का जब याद आता है
की हम किसी के दामन मैं सन्नाटा छोड़ आये हैं,

जलाती है हर बूँद बरसात की जब याद आता है
की हम किसी छत को टपकता हुआ छोड़ आये हैं,

बुरी लगती है इस घर की रंगो रंगत जब याद आता है
कि हम अपनी चौखट में एक टूटा किवाड़ा छोड़ आए है

Sunday, October 3, 2010

अंदाजा..!!

अहले खुशफहमी का जब से बंद दरवाजा हुआ,
अपनी बिसरी कद्र का तब भी नहीं अंदाजा हुआ |
भूलना चाहा उन हादसों को कई कई बार,
पर हर बहाने से वही लम्हा कई बार ताजा हुआ |
नैनों में सिमटे हुए पानी को हम कुछ भी न समझते थे,
आज जब उसी सैलाब में जा डूबे तभी अंदाजा हुआ |